श्रम एवं रोजगार समाधान नीति: एक पारदर्शी व्यवस्था की परिकल्पना
श्रम एवं रोजगार समाधान नीति: बेरोजगारी, रोजगार और श्रमिकों के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था की परिकल्पना
“हर हाथ को काम, हर श्रमिक को सम्मान और हर युवा को आत्मनिर्भर बनने का अवसर।”
प्रस्तावना
भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही युवा शक्ति तब चुनौती बन जाती है, जब शिक्षित और योग्य युवाओं को उनकी क्षमता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता।
बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने की समस्या नहीं है। इसका सीधा संबंध परिवार की आर्थिक स्थिति, युवाओं के मानसिक आत्मविश्वास, कौशल विकास, सामाजिक स्थिरता और देश की आर्थिक प्रगति से है।
भारत में रोजगार की स्थिति को समझने के लिए केवल बेरोजगारी दर देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि कितने लोग रोजगार की तलाश कर रहे हैं, कितने लोग वास्तव में काम कर रहे हैं, कितने लोग स्वरोजगार में हैं और कितने लोग अस्थायी या असुरक्षित रोजगार पर निर्भर हैं।
इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ श्रम एवं रोजगार समाधान नीति की परिकल्पना प्रस्तुत की गई है।
आज भारत में बेरोजगारी की वास्तविक स्थिति क्या है?
आपके मूल दस्तावेज़ में 2017-18 के आसपास के बेरोजगारी आँकड़ों का उल्लेख है। उस समय बेरोजगारों की संख्या और रोजगार के अवसरों में कमी को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी।
लेकिन आज स्थिति को समझने के लिए नवीनतम सरकारी आँकड़ों को देखना भी जरूरी है।
भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 4.9 प्रतिशत रही। वर्ष 2024 में यह 4.9 प्रतिशत थी।
वहीं युवाओं के लिए तस्वीर अधिक चुनौतीपूर्ण है। वर्ष 2025 में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग की बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत रही। ग्रामीण युवाओं के लिए यह 8.2 प्रतिशत और शहरी युवाओं के लिए 13.2 प्रतिशत के आसपास रही; पुरुष युवाओं की दर 8.2 प्रतिशत और महिला युवाओं की दर 13.5 प्रतिशत रही।
इससे स्पष्ट होता है कि सामान्य बेरोजगारी दर अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद युवा रोजगार एक अलग और गंभीर नीति चुनौती बना हुआ है।
वर्तमान स्थिति: बेरोजगारी दर घटी, लेकिन रोजगार की चुनौती समाप्त नहीं हुई
नवीनतम मासिक सरकारी आँकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की बेरोजगारी दर 5.1 प्रतिशत रही, जो जून 2026 के 5.5 प्रतिशत से कम थी। इसी महीने श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत और कार्यशील जनसंख्या अनुपात 52.5 प्रतिशत रहा।
जुलाई 2026 में ग्रामीण बेरोजगारी दर 4.5 प्रतिशत और शहरी बेरोजगारी दर 6.7 प्रतिशत रही। महिला श्रम बल भागीदारी दर बढ़कर 34.4 प्रतिशत हुई।
इन आँकड़ों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—
बेरोजगारी दर में कमी अपने आप में पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना होगा कि रोजगार किस प्रकार का है, उसकी आय कितनी है, उसकी स्थिरता कितनी है और युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर मिल रहे हैं या नहीं।
बेरोजगारी केवल नौकरी न मिलने का नाम नहीं
भारत में रोजगार की चुनौती को केवल खुले तौर पर बेरोजगार लोगों की संख्या से नहीं समझा जा सकता।
कई लोग ऐसे भी होते हैं जो काम तो करते हैं, लेकिन उनकी आय इतनी कम होती है कि वे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते।
कई लोग अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करने के लिए मजबूर होते हैं।
कई लोग अस्थायी काम करते हैं।
कई लोग वर्ष के कुछ महीनों में ही रोजगार प्राप्त करते हैं।
कई लोग स्वरोजगार करते हैं लेकिन उनके पास पर्याप्त पूंजी, बाजार या सामाजिक सुरक्षा नहीं होती।
इसलिए रोजगार नीति में बेरोजगारी के साथ-साथ अल्परोजगार, अस्थायी रोजगार, कौशल-असंगति और आय की असुरक्षा को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
युवा बेरोजगारी सबसे बड़ी चुनौती क्यों है?
युवा किसी भी देश की आर्थिक शक्ति होते हैं।
यदि 20 से 30 वर्ष की आयु का व्यक्ति शिक्षा पूरी करने के बाद लंबे समय तक रोजगार की तलाश करता रहता है, तो उसका प्रभाव केवल उसकी आय पर नहीं पड़ता।
इससे—
- परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।
- कौशल का उपयोग नहीं हो पाता।
- कार्य अनुभव प्राप्त करने में देरी होती है।
- प्रतियोगी परीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ सकती है।
- मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
- युवाओं का स्वरोजगार शुरू करने का अवसर कम हो सकता है।
वर्ष 2025 में 15-29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत होना बताता है कि युवा रोजगार के लिए विशेष नीति की आवश्यकता है।
रोजगार की समस्या का एक कारण—व्यवस्था का बिखराव
आपके मूल प्रस्ताव में यह प्रश्न उठाया गया है कि सरकार के पास देश में वास्तविक बेरोजगार युवाओं और उपलब्ध रिक्तियों का स्पष्ट, एकीकृत और लगातार अद्यतन आँकड़ा होना चाहिए।
यही हमारी श्रम एवं रोजगार समाधान नीति का आधार है।
यदि सरकार के पास वास्तविक समय में यह जानकारी उपलब्ध हो कि—
किस जिले में कितने बेरोजगार हैं?
किसके पास कौन-सा कौशल है?
किस क्षेत्र में कितनी रिक्तियाँ हैं?
कौन-सी संस्था में कब पद खाली होने वाला है?
किस उद्योग को किस प्रकार के श्रमिक की आवश्यकता है?
तो रोजगार नीति अधिक लक्षित और प्रभावी बनाई जा सकती है।
श्रम एवं रोजगार की एकीकृत डिजिटल व्यवस्था
प्रस्तावित श्रम एवं रोजगार समाधान नीति के अंतर्गत एक ऐसी डिजिटल प्रणाली विकसित करने की परिकल्पना है जिसमें सरकारी, गैर-सरकारी और निजी संस्थाओं को एक साझा मंच से जोड़ा जा सके।
इस व्यवस्था के माध्यम से—
- संस्था का पंजीकरण
- रिक्त पद
- आवेदन
- परीक्षा
- परिणाम
- नियुक्ति
- कर्मचारी रिकॉर्ड
- सेवा विवरण
- सेवानिवृत्ति
जैसी प्रक्रियाओं का डिजिटल प्रबंधन किया जा सकेगा।
प्रत्येक रिक्त पद की डिजिटल जानकारी
किसी सरकारी या निजी संस्था में कोई पद खाली होता है, तो उसकी जानकारी डिजिटल प्रणाली में दर्ज की जा सकेगी।
इससे यह पता चलता रहेगा कि—
- कौन-सा पद खाली है?
- किस विभाग में खाली है?
- किस जिले में खाली है?
- कितने पद खाली हैं?
- किस योग्यता की आवश्यकता है?
- आवेदन कब शुरू होगा?
- चयन प्रक्रिया कब होगी?
इससे रोजगार की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने में सहायता मिल सकती है।
रोजगार के लिए तीन चरणों की व्यवस्था
मूल नीति में रोजगार प्रबंधन को तीन प्रमुख चरणों में व्यवस्थित करने की परिकल्पना की गई है।
पहला चरण — संस्थाओं का पंजीकरण
देश की सरकारी, गैर-सरकारी और निजी संस्थाओं को रोजगार प्रबंधन प्रणाली में शामिल करना।
दूसरा चरण — श्रमिकों का पंजीकरण
संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का स्पष्ट डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना।
तीसरा चरण — नियुक्ति व्यवस्था का एकीकरण
सरकारी और निजी क्षेत्र में उपलब्ध नियुक्ति प्रक्रियाओं को डिजिटल प्रणाली से जोड़ना।
बेरोजगार व्यक्ति की डिजिटल पहचान
प्रस्तावित व्यवस्था में भारतीय पहचान पात्रता संख्या के आधार पर यह पता लगाने की परिकल्पना है कि देश में कितने ऐसे युवा हैं जिनके पास रोजगार या आय का कोई नियमित स्रोत नहीं है।
इससे सरकार को केवल बेरोजगारी दर नहीं, बल्कि व्यक्ति-आधारित रोजगार संबंधी जानकारी उपलब्ध हो सकती है।
उदाहरण के लिए—
“इस जिले में 25,000 बेरोजगार युवा हैं, जिनमें 8,000 तकनीकी शिक्षा प्राप्त हैं, 5,000 स्वास्थ्य क्षेत्र से संबंधित हैं, 3,000 आईटी कौशल रखते हैं और 9,000 अन्य कौशल क्षेत्रों से जुड़े हैं।”
ऐसी जानकारी रोजगार नीति को अधिक लक्षित बना सकती है।
संगठित और असंगठित श्रमिकों की वास्तविक स्थिति
भारत की श्रम व्यवस्था का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है।
मूल दस्तावेज़ में भी संगठित और असंगठित श्रमिकों को अलग-अलग श्रेणियों में समझाते हुए असंगठित श्रमिकों की सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है।
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में—
- खेतिहर मजदूर
- निर्माण मजदूर
- छोटे कारीगर
- पशुपालक
- मछुआरे
- ग्रामीण कारीगर
- सड़क विक्रेता
- रिक्शा चालक
- छोटे व्यापारी
- घरेलू कामगार
- परिवहन श्रमिक
- छोटे उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक
जैसे अनेक वर्ग शामिल हैं।
असंगठित श्रमिकों की सबसे बड़ी समस्या
असंगठित श्रमिकों के सामने केवल रोजगार की समस्या नहीं होती।
उनके सामने—
रोजगार की अनिश्चितता + आय की अनिश्चितता + सामाजिक सुरक्षा का अभाव
तीनों समस्याएँ एक साथ मौजूद हो सकती हैं।
मूल नीति में बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्था, न्यूनतम आय, आवास, स्वास्थ्य सुविधा, अवकाश और सेवानिवृत्ति जैसी सामाजिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है।
इसलिए रोजगार नीति को केवल नौकरी दिलाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
श्रम एवं रोजगार प्राधिकरण की परिकल्पना
मूल प्रस्ताव में LAEA — Labour and Employment Authority के गठन की परिकल्पना की गई है।
इस प्राधिकरण का उद्देश्य संगठित और असंगठित दोनों प्रकार के श्रमिकों के आँकड़ों को व्यवस्थित रखना तथा उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य करना है।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य एक व्यापक श्रम डेटाबेस तैयार करना होगा, जिससे सरकार को पता रहे कि देश में कितने लोग काम कर रहे हैं और कितने लोग रोजगार की तलाश में हैं।
असंगठित श्रमिकों के लिए रोजगार मंच
प्रस्तावित व्यवस्था में खेतिहर मजदूरों, निर्माण मजदूरों और अन्य अस्थायी श्रमिकों को डिजिटल मंच से जोड़ने की परिकल्पना की गई है।
उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को अपने घर का निर्माण कराना है।
वह अपने क्षेत्र के उपलब्ध श्रमिकों की जानकारी डिजिटल मंच पर देख सकेगा।
श्रमिक अपनी सुविधा के अनुसार—
- दैनिक
- साप्ताहिक
- मासिक
- घंटे के आधार पर
काम स्वीकार कर सकेगा।
इससे श्रमिक और रोजगार देने वाले व्यक्ति के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया जा सकता है।
25 दिन रोजगार की परिकल्पना
मूल नीति में खेतिहर और निर्माण श्रमिकों के लिए प्रत्येक माह 25 दिन रोजगार उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।
यदि कोई पात्र श्रमिक निर्धारित 25 दिनों का काम पूरा करता है, तो प्रस्ताव में अतिरिक्त सहायता के रूप में पाँच दिनों की मजदूरी सरकार द्वारा देने की परिकल्पना भी की गई है।
यह एक नीतिगत प्रस्ताव है; इसे लागू करने के लिए वित्तीय क्षमता, पात्रता, श्रम कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होगा।
न्यूनतम मजदूरी और श्रमिक सम्मान
प्रस्तावित नीति में अलग-अलग श्रेणी के असंगठित श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने का विचार रखा गया है। मूल दस्तावेज़ में खेतीहर एवं सामान्य श्रमिकों के लिए ₹350 प्रतिदिन, मिस्त्री वर्ग के लिए ₹500 और मालवाहक/परिवहन चालकों के लिए ₹600 प्रतिदिन जैसी प्रस्तावित दरें दी गई हैं।
इन दरों को आज की महँगाई और वर्तमान न्यूनतम मजदूरी कानूनों के अनुरूप पुनरीक्षित करना आवश्यक होगा।
मूल विचार यह है कि श्रमिक को उसके श्रम का उचित और पारदर्शी मूल्य मिले।
श्रमिक के काम का डिजिटल रिकॉर्ड
यदि किसी श्रमिक की दैनिक कार्य अवधि और भुगतान डिजिटल रूप से दर्ज हो, तो मजदूरी विवाद को कम करने में सहायता मिल सकती है।
प्रस्तावित व्यवस्था में यह रिकॉर्ड रखा जा सकता है कि—
- श्रमिक ने कितने घंटे काम किया?
- कितने दिन काम किया?
- किस संस्था या व्यक्ति के लिए काम किया?
- निर्धारित मजदूरी कितनी थी?
- भुगतान कितना हुआ?
- भुगतान कब हुआ?
इससे श्रमिक और नियोक्ता दोनों के लिए पारदर्शी व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
रोजगार परीक्षा और नियुक्ति प्रबंधन
सरकारी और निजी क्षेत्र में नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए मूल नीति में जिला स्तर पर परीक्षा और नियुक्ति प्रबंधन की परिकल्पना की गई है।
प्रस्ताव के अनुसार—
आवेदन → परीक्षा → परिणाम → नियुक्ति
की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से संचालित किया जा सकता है।
इससे उम्मीदवार को बार-बार अलग-अलग कार्यालयों में जाने की आवश्यकता कम हो सकती है।
जिले से रोजगार तक
प्रस्तावित नीति में जिला स्तर के रोजगार केंद्रों को आधुनिक बनाने का विचार है।
प्रत्येक जिले में एक ऐसा डिजिटल रोजगार केंद्र हो सकता है जहाँ—
- रोजगार पंजीकरण
- कौशल पंजीकरण
- सरकारी नौकरी
- निजी नौकरी
- प्रशिक्षण
- स्वरोजगार
- परीक्षा
- नियुक्ति
से संबंधित जानकारी उपलब्ध हो।
इससे रोजगार व्यवस्था को केवल बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय जिला और स्थानीय स्तर तक पहुँचाने में सहायता मिल सकती है।
परिणाम और नियुक्ति पत्र भी डिजिटल
प्रस्तावित व्यवस्था में परीक्षा परिणाम शीघ्र जारी करने और नियुक्ति पत्र डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।
इससे भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और कागजी प्रक्रिया को कम किया जा सकता है।
घर से रोजगार की नई संभावनाएँ
आज रोजगार केवल कार्यालय या कारखाने तक सीमित नहीं है।
आईटी, डिजिटल सेवाओं, डिजाइन, लेखन, ग्राहक सहायता, सॉफ्टवेयर, डिजिटल मार्केटिंग और अनेक अन्य क्षेत्रों में घर से काम करना संभव है।
मूल नीति में रिमोट वर्क प्रक्रिया को स्थायी रोजगार विकल्प के रूप में मान्यता देने और आईटी क्षेत्र को बढ़ावा देने की परिकल्पना की गई है।
इससे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को भी देश-विदेश की कंपनियों के लिए काम करने के अवसर मिल सकते हैं।
रोजगार का भविष्य: नौकरी के साथ स्वरोजगार
आने वाले समय में रोजगार नीति को केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
सरकार को तीन स्तरों पर एक साथ काम करना होगा—
नौकरी
सरकारी और निजी क्षेत्र में उपलब्ध रिक्तियों को पारदर्शी तरीके से भरना।
स्वरोजगार
युवाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार उपलब्ध कराना।
कौशल आधारित रोजगार
उद्योग की आवश्यकता के अनुसार युवाओं को प्रशिक्षण देना।
शिक्षा और रोजगार के बीच सीधा संबंध
बेरोजगारी का एक महत्वपूर्ण पहलू कौशल और रोजगार की आवश्यकता के बीच अंतर भी है।
यदि कोई युवा ऐसी शिक्षा प्राप्त करता है जिसकी बाजार में सीमित मांग है, तो डिग्री प्राप्त करने के बाद भी उसे रोजगार मिलने में कठिनाई हो सकती है।
इसलिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगार व्यवस्था से जोड़ना आवश्यक है।
प्रत्येक विद्यार्थी की छात्र पहचान, शिक्षा, कौशल और प्रशिक्षण का रिकॉर्ड रोजगार प्रणाली से जोड़ा जा सकता है।
इससे किसी कंपनी को यह जानने में सहायता मिल सकती है कि उसे किस प्रकार के कौशल वाले कितने युवाओं की आवश्यकता है।
महिला रोजगार को विशेष प्राथमिकता
रोजगार नीति में महिलाओं की श्रम भागीदारी को विशेष महत्व देना आवश्यक है।
2025 में भारत की 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिला श्रम बल भागीदारी दर सामान्य स्थिति के आधार पर 40 प्रतिशत रही।
इसलिए महिलाओं के लिए—
- घर से काम
- लचीला रोजगार
- कौशल प्रशिक्षण
- डिजिटल रोजगार
- स्थानीय रोजगार
- सुरक्षित कार्यस्थल
- मातृत्व सहायता
जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना रोजगार विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का एकीकरण
रोजगार मिलने के बाद भी श्रमिक की सुरक्षा सुनिश्चित होना आवश्यक है।
एक आधुनिक श्रम व्यवस्था में श्रमिक की पहचान के साथ—
रोजगार + मजदूरी + स्वास्थ्य + दुर्घटना सुरक्षा + सामाजिक सुरक्षा + कौशल प्रशिक्षण
को जोड़ने की आवश्यकता है।
इससे श्रमिक केवल रोजगार पाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक श्रम व्यवस्था का हिस्सा बन सकेगा।
हमारी श्रम एवं रोजगार समाधान नीति के प्रमुख स्तंभ
1. डिजिटल श्रमिक पंजीकरण
संगठित और असंगठित श्रमिकों का एकीकृत रिकॉर्ड।
2. बेरोजगार युवाओं का पंजीकरण
रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं की स्पष्ट जानकारी।
3. संस्थाओं का पंजीकरण
सरकारी और निजी संस्थाओं को रोजगार प्रणाली से जोड़ना।
4. रिक्तियों की डिजिटल जानकारी
हर संस्था के खाली पदों का अद्यतन रिकॉर्ड।
5. कौशल आधारित रोजगार
व्यक्ति की योग्यता और कौशल के अनुसार रोजगार।
6. पारदर्शी नियुक्ति
आवेदन से नियुक्ति तक डिजिटल प्रक्रिया।
7. असंगठित श्रमिकों के लिए रोजगार मंच
स्थानीय श्रमिक और स्थानीय रोजगार को जोड़ना।
8. न्यूनतम मजदूरी और समय का रिकॉर्ड
काम और भुगतान में पारदर्शिता।
9. सामाजिक सुरक्षा
श्रमिकों को स्वास्थ्य, दुर्घटना और अन्य सुरक्षा से जोड़ना।
10. घर से रोजगार
रिमोट वर्क और डिजिटल रोजगार को बढ़ावा देना।
आज की आवश्यकता: बेरोजगारी की गणना से आगे बढ़ना
आज भारत के सामने केवल यह प्रश्न नहीं है कि बेरोजगारी दर कितनी है।
बड़ा प्रश्न यह है—
कितने युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिला?
कितने लोगों के पास स्थायी आय है?
कितने श्रमिक सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं?
कितने लोग अस्थायी रोजगार पर निर्भर हैं?
कितने युवाओं के पास कौशल है लेकिन अवसर नहीं है?
किस जिले में किस प्रकार के रोजगार की आवश्यकता है?
इन प्रश्नों के उत्तर बिना विश्वसनीय और अद्यतन आँकड़ों के नहीं मिल सकते।
हमारा रोजगार समाधान मॉडल
हमारी परिकल्पना में रोजगार व्यवस्था का मूल ढाँचा इस प्रकार होगा—
भारतीय पहचान → श्रमिक/युवा पंजीकरण → शिक्षा एवं कौशल → रोजगार की आवश्यकता → रिक्त पद → आवेदन → परीक्षा/चयन → नियुक्ति → रोजगार रिकॉर्ड → सामाजिक सुरक्षा
इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से जोड़ने का उद्देश्य है कि सरकार, रोजगारदाता और श्रमिक—तीनों के पास आवश्यक जानकारी उपलब्ध हो।
हमारा संकल्प
भारत में बेरोजगारी का समाधान केवल सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ाने से नहीं होगा।
इसके लिए आवश्यक है कि—
हर युवा की क्षमता पहचानी जाए,
हर कौशल का रिकॉर्ड हो,
हर रिक्त पद की जानकारी हो,
हर श्रमिक का पंजीकरण हो,
हर मजदूर को उचित मजदूरी मिले,
हर रोजगारदाता की जवाबदेही हो,
हर नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो,
और हर व्यक्ति को रोजगार के साथ आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिले।
भारत की युवा शक्ति को बेरोजगारी की समस्या से निकालकर रोजगार, कौशल, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की शक्ति में बदलना ही इस नीति का मूल उद्देश्य है।
“हर हाथ को काम, हर श्रमिक को सम्मान और हर युवा को आत्मनिर्भरता का अवसर।”
श्रम एवं रोजगार समाधान नीति
पारदर्शी रोजगार • सुरक्षित श्रमिक • कौशलयुक्त युवा • आत्मनिर्भर भारत
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