विद्युत समाधान नीति
विद्युत आधुनिक विकास की आधारशिला है। हमारा लक्ष्य ऐसी ऊर्जा व्यवस्था का निर्माण करना है, जिसमें पर्याप्त उत्पादन, मजबूत वितरण नेटवर्क, कम हानि, पारदर्शी प्रबंधन और प्रत्येक नागरिक को विश्वसनीय बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
विद्युत समाधान नीति: सस्ती, विश्वसनीय और तकनीक आधारित ऊर्जा व्यवस्था की परिकल्पना
“विद्युत आधुनिक विकास की आधारशिला है। हमारा लक्ष्य ऐसी ऊर्जा व्यवस्था का निर्माण करना है, जिसमें पर्याप्त उत्पादन, मजबूत वितरण नेटवर्क, कम हानि, पारदर्शी प्रबंधन और प्रत्येक नागरिक को विश्वसनीय बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित हो।”
प्रस्तावना
आज के आधुनिक युग में विद्युत केवल रोशनी का माध्यम नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, डिजिटल सेवाओं, रोजगार, संचार और आर्थिक विकास की आधारभूत आवश्यकता बन चुकी है।
किसी देश की आर्थिक प्रगति का सीधा संबंध उसकी ऊर्जा उपलब्धता और ऊर्जा के कुशल उपयोग से है। घरों में बिजली से लेकर अस्पतालों, विद्यालयों, कारखानों, कृषि पंपों, कंप्यूटर, इंटरनेट और आधुनिक तकनीक तक—हर क्षेत्र विद्युत पर निर्भर है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में बिजली उत्पादन, विद्युत पहुँच और वितरण व्यवस्था में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इसलिए आज की चुनौती केवल यह नहीं है कि “देश में बिजली पहुँची या नहीं”, बल्कि यह है कि “हर नागरिक को कितनी विश्वसनीय, गुणवत्तापूर्ण और वहनीय बिजली मिल रही है?”
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति विद्युत खपत 2012-13 में लगभग 914 यूनिट से बढ़कर 2023-24 में लगभग 1,400 यूनिट हो गई और 2024-25 के लिए यह लगभग 1,460 यूनिट अनुमानित है। (Central Electricity Authority)
इससे स्पष्ट है कि देश में बिजली की मांग और उपयोग दोनों लगातार बढ़ रहे हैं।
भारत की वर्तमान विद्युत स्थिति
भारत की ऊर्जा व्यवस्था में आज कोयला, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा तथा सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय स्रोतों का महत्वपूर्ण योगदान है।
31 मार्च 2025 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता लगभग 475.21 गीगावाट थी। इसमें लगभग 220.10 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता शामिल थी। इसी अवधि में कुल विद्युत उत्पादन लगभग 1,829.70 बिलियन यूनिट रहा। (Central Electricity Authority)
यह परिवर्तन बताता है कि भारत की ऊर्जा व्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है और नवीकरणीय ऊर्जा का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन स्थापित क्षमता बढ़ना और प्रत्येक उपभोक्ता तक लगातार गुणवत्तापूर्ण बिजली पहुँचना दो अलग-अलग विषय हैं। इसलिए उत्पादन के साथ-साथ पारेषण, वितरण, मीटरिंग और स्थानीय नेटवर्क को मजबूत करना भी आवश्यक है।
बिजली की पहुँच में बड़ा सुधार, लेकिन गुणवत्ता अभी भी महत्वपूर्ण चुनौती
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 28 अप्रैल 2018 तक देश के सभी आबाद गैर-विद्युतीकृत जनगणना गाँवों का विद्युतीकरण पूरा हो गया था। इसके बाद सौभाग्य योजना के दौरान लगभग 2.86 करोड़ इच्छुक परिवारों को बिजली कनेक्शन दिए गए। (Power Ministry of India)
फिर भी कुछ छूटे हुए परिवारों तथा विशेष रूप से दूरस्थ, आदिवासी, सीमा और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों के परिवारों के लिए विद्युतीकरण का कार्य जारी है। सरकार के अनुसार RDSS के अंतर्गत लगभग 13.65 लाख परिवारों के विद्युतीकरण के लिए कार्य स्वीकृत किए गए हैं। (Power Ministry of India)
इसलिए आज विद्युत नीति का लक्ष्य केवल “कनेक्शन देना” नहीं होना चाहिए, बल्कि—
कनेक्शन + पर्याप्त आपूर्ति + गुणवत्ता + विश्वसनीयता + उचित मूल्य
को एक साथ सुनिश्चित करना चाहिए।
विद्युत क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ
1. बढ़ती विद्युत मांग
देश में उद्योग, डिजिटल सेवाओं, इलेक्ट्रिक वाहनों, शहरीकरण, कृषि और घरेलू उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत की ऊर्जा आवश्यकता लगभग 1,693.96 बिलियन यूनिट रही और अधिकतम मांग लगभग 2,49,856 मेगावाट तक पहुँची। उपलब्ध आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार इस वर्ष ऊर्जा की लगभग पूरी मांग की आपूर्ति की गई।
इसलिए भविष्य के लिए केवल वर्तमान मांग पूरी करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें भविष्य की मांग का पूर्वानुमान लगाकर पहले से उत्पादन और पारेषण क्षमता तैयार करनी होगी।
2. उत्पादन क्षमता और ईंधन सुरक्षा
भारत की विद्युत व्यवस्था में अभी भी तापीय ऊर्जा, विशेषकर कोयला आधारित उत्पादन, महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वहीं दूसरी ओर सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। इसलिए भारत को ऐसी संतुलित ऊर्जा नीति की आवश्यकता है जिसमें—
कोयला आधारित विद्युत
जलविद्युत
परमाणु ऊर्जा
सौर ऊर्जा
पवन ऊर्जा
जैव ऊर्जा
ऊर्जा भंडारण
सभी की भूमिका स्पष्ट हो।
भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए उत्पादन के साथ-साथ ऊर्जा भंडारण और ग्रिड संतुलन पर भी विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
3. नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
31 मार्च 2025 तक स्थापित क्षमता में सौर ऊर्जा लगभग 105.65 GW, पवन ऊर्जा लगभग 50.04 GW, बड़े जलविद्युत की क्षमता लगभग 47.73 GW और छोटी जलविद्युत क्षमता लगभग 5.10 GW थी। (Central Electricity Authority)
इसलिए आने वाले समय में ऊर्जा नीति का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए—
“स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार और ऊर्जा भंडारण का विकास।”
सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर होती हैं। इसलिए इनके साथ बैटरी स्टोरेज, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज और अन्य आधुनिक ऊर्जा भंडारण तकनीकों को विकसित करना आवश्यक होगा।
4. पारेषण व्यवस्था की मजबूती
भारत में किसी क्षेत्र में बिजली का उत्पादन अधिक हो सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्र में मांग अधिक हो सकती है।
इसलिए उत्पादन केंद्रों से बिजली को मांग वाले क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए मजबूत राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पारेषण नेटवर्क आवश्यक है।
हमारी प्रस्तावित नीति में—
उच्च क्षमता वाली ट्रांसमिशन लाइन
आधुनिक ग्रिड
स्मार्ट सब-स्टेशन
डिजिटल लोड मॉनिटरिंग
ग्रिड बैलेंसिंग
नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ग्रीन ट्रांसमिशन नेटवर्क
को प्राथमिकता देने की परिकल्पना है।
5. वितरण व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती
बिजली उत्पादन और पारेषण के बाद अंतिम चरण वितरण व्यवस्था है।
यहीं से बिजली उपभोक्ता के घर, खेत, दुकान और उद्योग तक पहुँचती है।
वर्तमान में वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति, बिजली चोरी, तकनीकी हानि, मीटरिंग की कमियाँ और बिलिंग-कलेक्शन की समस्याएँ कई क्षेत्रों में चुनौती बनी हुई हैं।
हालाँकि स्थिति में सुधार हुआ है। सरकारी जानकारी के अनुसार देश में वितरण कंपनियों का औसत AT&C Loss FY2021 के 21.91% से घटकर FY2025 में 15.04% हो गया है। (Press Information Bureau)
इसलिए पुराने 25 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत को वर्तमान आँकड़े के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय 15.04 प्रतिशत का FY2025 आँकड़ा उपयोग करना अधिक उचित होगा।
6. राज्यों में वितरण हानि की असमानता
राष्ट्रीय औसत में सुधार के बावजूद सभी राज्यों और वितरण कंपनियों की स्थिति समान नहीं है।
उदाहरण के लिए 2023-24 में कुछ क्षेत्रों में AT&C Loss काफी अधिक रहा। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नागालैंड में यह लगभग 47.11%, अरुणाचल प्रदेश में 44.56%, मिजोरम में 34.85% और झारखंड में 31.17% था। वहीं दिल्ली, गुजरात और केरल जैसे राज्यों में यह काफी कम था।
इसलिए एक समान समाधान के बजाय राज्य और वितरण क्षेत्र की वास्तविक स्थिति के अनुसार स्थानीय समाधान आवश्यक है।
विद्युत समाधान नीति
हमारा लक्ष्य
हमारी विद्युत समाधान नीति का उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन बढ़ाना नहीं है।
हम एक ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना करते हैं जिसमें—
उत्पादन → पारेषण → वितरण → मीटरिंग → बिलिंग → शिकायत → निगरानी
की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल तकनीक से जोड़ा जा सके।
1. विद्युत उत्पादन का संतुलित विस्तार
सरकार ऊर्जा की आवश्यकता का वैज्ञानिक पूर्वानुमान तैयार करेगी।
इसके आधार पर—
सौर ऊर्जा
पवन ऊर्जा
जलविद्युत
परमाणु ऊर्जा
तापीय ऊर्जा
जैव ऊर्जा
ऊर्जा भंडारण
के लिए दीर्घकालिक योजना बनाई जाएगी।
हमारा लक्ष्य होगा कि ऊर्जा की मांग बढ़ने से पहले आवश्यक उत्पादन क्षमता और ग्रिड क्षमता तैयार हो।
2. सस्ती विद्युत के लिए लक्षित नीति
आपके मूल प्रस्ताव में घरेलू और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए ₹2, ₹3 और ₹5 प्रति यूनिट जैसी दरों का प्रस्ताव है।
इसे एक राजनीतिक लक्ष्य/प्रस्ताव के रूप में रखा जा सकता है, लेकिन इसे वर्तमान बाजार दर या सार्वभौमिक रूप से लागू वास्तविक दर के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। वास्तविक बिजली दरें राज्य विद्युत नियामक आयोगों द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
हमारी प्रस्तावित नीति में निम्न विचार रखा जा सकता है—
ग्रामीण कृषि उपभोक्ता
कृषि कार्यों के लिए सस्ती और लक्षित विद्युत उपलब्ध कराने की व्यवस्था।
निम्न आय वाले परिवार
निर्धारित खपत सीमा तक सब्सिडी अथवा प्रत्यक्ष लाभ सहायता।
सामान्य घरेलू उपभोक्ता
उचित और पारदर्शी स्लैब आधारित दर।
वाणिज्यिक एवं औद्योगिक उपभोक्ता
प्रतिस्पर्धी दर पर विश्वसनीय बिजली, ताकि उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिले।
इससे बिजली की कीमत को सामाजिक आवश्यकता और आर्थिक व्यवहार्यता दोनों से जोड़ा जा सकेगा।
3. “ऑन-कॉल विद्युत सेवा” प्रणाली
प्रस्तावित व्यवस्था में उपभोक्ता बिजली विभाग से सीधे डिजिटल माध्यम से संपर्क कर सकेगा।
उदाहरण के लिए—
नया कनेक्शन
मीटर परिवर्तन
बिजली कटौती की शिकायत
ट्रांसफॉर्मर खराब
तार टूटना
वोल्टेज की समस्या
बिल संबंधी शिकायत
कनेक्शन स्थानांतरण
जैसी सेवाओं के लिए एकीकृत डिजिटल प्रणाली बनाई जा सकती है।
हर शिकायत को एक शिकायत संख्या दी जाएगी।
उपभोक्ता अपने मोबाइल से शिकायत की स्थिति देख सकेगा।
4. नया बिजली कनेक्शन
नए कनेक्शन के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था को और सरल बनाया जाएगा।
आवेदन के बाद—
आवेदन → दस्तावेज सत्यापन → तकनीकी जाँच → कनेक्शन स्वीकृति → मीटर स्थापना → कनेक्शन सक्रिय
की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से ट्रैक की जा सकेगी।
24 घंटे में कनेक्शन देने का लक्ष्य केवल उन मामलों में रखा जाना चाहिए जहाँ तकनीकी रूप से नया नेटवर्क या अतिरिक्त आधारभूत संरचना बनाने की आवश्यकता न हो।
इस प्रकार समय सीमा व्यवहारिक और सेवा-क्षमता के आधार पर निर्धारित की जा सकती है।
5. स्मार्ट मीटर और प्रीपेड मीटर
विद्युत चोरी और बिलिंग संबंधी विवादों को कम करने के लिए आधुनिक स्मार्ट मीटरिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
प्रस्तावित प्रणाली में—
स्मार्ट मीटर + प्रीपेड विकल्प + मोबाइल ऐप + डिजिटल बिलिंग
को एकीकृत करने की परिकल्पना है।
उपभोक्ता अपने मोबाइल पर देख सकेगा—
आज की बिजली खपत
महीने की कुल खपत
अनुमानित बिल
दैनिक खपत का पैटर्न
पीक टाइम खपत
मीटर की स्थिति
इससे उपभोक्ता स्वयं भी अपनी बिजली खपत को नियंत्रित कर सकेगा।
सरकार की RDSS योजना में स्मार्ट मीटरिंग और वितरण सुधार को पहले से महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
6. ट्रांसफॉर्मर पर स्मार्ट लोड मीटर
आपके मूल प्रस्ताव का यह भाग विशेष रूप से उपयोगी है।
केवल घरों में मीटर लगाने से बिजली चोरी का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। वितरण नेटवर्क के विभिन्न स्तरों पर भी ऊर्जा का हिसाब होना चाहिए।
इसलिए हमारी प्रस्तावित व्यवस्था में—
उपभोक्ता मीटर → वितरण ट्रांसफॉर्मर मीटर → फीडर मीटर → सब-स्टेशन मीटर
का ऊर्जा लेखांकन विकसित किया जा सकता है।
इससे यह पता चल सकेगा कि किसी क्षेत्र में कितनी बिजली भेजी गई और उपभोक्ताओं तक कितनी बिजली पहुँची।
यही अंतर तकनीकी हानि, वाणिज्यिक हानि और संभावित चोरी की पहचान में मदद करेगा।
7. बिजली चोरी पर तकनीक आधारित नियंत्रण
बिजली चोरी रोकने के लिए केवल छापेमारी पर्याप्त नहीं है।
इसके लिए डेटा आधारित प्रणाली विकसित की जा सकती है।
यदि किसी ट्रांसफॉर्मर में—
इनपुट ऊर्जा = 10,000 यूनिट
और उस क्षेत्र के सभी उपभोक्ताओं की कुल दर्ज खपत—
7,000 यूनिट
है, तो सिस्टम स्वतः असामान्य अंतर की पहचान कर सकता है।
इसके बाद तकनीकी जाँच की जा सकती है।
इससे चोरी की पहचान डेटा और ऊर्जा लेखांकन के आधार पर होगी, न कि केवल व्यक्तिगत शिकायत या अधिकारी की धारणा पर।
8. विद्युत शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण
प्रत्येक शिकायत के लिए उसकी प्रकृति के अनुसार अधिकतम निस्तारण समय निर्धारित किया जा सकता है।
उदाहरण—
आपातकालीन लाइन फॉल्ट → तत्काल प्राथमिकता
ट्रांसफॉर्मर खराब → निर्धारित समय सीमा
मीटर संबंधी शिकायत → निर्धारित सेवा समय
बिल संबंधी शिकायत → डिजिटल सत्यापन के बाद समयबद्ध समाधान
प्रत्येक शिकायत की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी या तकनीकी टीम को डिजिटल रूप से आवंटित की जा सकती है।
9. ग्रामीण विद्युत व्यवस्था
ग्रामीण क्षेत्र में बिजली केवल घरों के लिए नहीं, बल्कि—
सिंचाई
कृषि प्रसंस्करण
छोटे उद्योग
कोल्ड स्टोरेज
शिक्षा
स्वास्थ्य
डिजिटल सेवाएँ
के लिए भी आवश्यक है।
इसलिए ग्रामीण विद्युत नीति में कृषि फीडर, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और स्थानीय वितरण नेटवर्क को मजबूत करने की आवश्यकता है।
10. सौर ऊर्जा और स्थानीय ऊर्जा उत्पादन
दूरदराज क्षेत्रों में जहाँ पारंपरिक ग्रिड विस्तार महँगा या कठिन हो, वहाँ आवश्यकता के अनुसार—
रूफटॉप सोलर
सामुदायिक सोलर प्लांट
सोलर सिंचाई पंप
बैटरी स्टोरेज
माइक्रोग्रिड
जैसी प्रणालियों को विकसित किया जा सकता है।
इससे स्थानीय स्तर पर ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा और मुख्य ग्रिड पर दबाव कम हो सकता है।
11. विद्युत आपूर्ति की गुणवत्ता
बिजली उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है।
उपभोक्ता को स्थिर वोल्टेज और विश्वसनीय आपूर्ति भी मिलनी चाहिए।
इसलिए विद्युत व्यवस्था के मूल्यांकन में केवल कनेक्शनों की संख्या नहीं, बल्कि—
औसत आपूर्ति घंटे
वोल्टेज गुणवत्ता
फॉल्ट की संख्या
कटौती की अवधि
शिकायतों की संख्या
ट्रांसफॉर्मर विफलता
पुनर्स्थापन समय
जैसे मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
सरकारी जानकारी के अनुसार FY2025 में ग्रामीण क्षेत्रों में औसत बिजली आपूर्ति लगभग 22.6 घंटे प्रतिदिन और शहरी क्षेत्रों में लगभग 23.4 घंटे प्रतिदिन रही। (Power Ministry of India)
12. विद्युत क्षेत्र में पारदर्शिता
हमारी प्रस्तावित डिजिटल व्यवस्था में सरकार और उपभोक्ता दोनों के लिए प्रमुख विद्युत आँकड़े उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
जैसे—
किस क्षेत्र में कितनी बिजली की मांग है?
कितनी बिजली उपलब्ध है?
कितनी बिजली भेजी गई?
कितनी बिजली बिकी?
कितनी तकनीकी हानि हुई?
कहाँ असामान्य खपत है?
कहाँ ट्रांसफॉर्मर पर अधिक भार है?
कहाँ बार-बार फॉल्ट हो रहे हैं?
इस डेटा के आधार पर सरकार वास्तविक आवश्यकता के अनुसार निवेश और सुधार कर सकेगी।
13. भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था
भारत को आने वाले वर्षों में केवल अधिक बिजली पैदा करने की नहीं, बल्कि स्मार्ट ऊर्जा प्रणाली बनाने की आवश्यकता है।
भविष्य की व्यवस्था में—
स्मार्ट ग्रिड
बिजली के प्रवाह की डिजिटल निगरानी।
स्मार्ट मीटर
वास्तविक समय में खपत की जानकारी।
ऊर्जा भंडारण
सौर और पवन ऊर्जा को जरूरत के समय उपयोग करना।
डिजिटल शिकायत प्रणाली
समस्या का त्वरित समाधान।
डेटा आधारित ऊर्जा योजना
भविष्य की मांग का पूर्वानुमान।
नवीकरणीय ऊर्जा
स्वच्छ और दीर्घकालिक ऊर्जा स्रोतों का विस्तार।
इन सभी को एकीकृत किया जाना चाहिए।
हमारी विद्युत समाधान नीति के तीन प्रमुख आधार
पहला — पर्याप्त उत्पादन
देश की वर्तमान और भविष्य की मांग के अनुसार बिजली उत्पादन क्षमता का विस्तार करना।
दूसरा — मजबूत पारेषण एवं वितरण
उत्पादन केंद्र से उपभोक्ता तक बिजली पहुँचाने के लिए मजबूत और आधुनिक नेटवर्क तैयार करना।
तीसरा — डिजिटल एवं पारदर्शी प्रबंधन
मीटरिंग, बिलिंग, शिकायत, चोरी नियंत्रण और ऊर्जा लेखांकन को डिजिटल तकनीक से जोड़ना।
भारत ने विद्युत क्षेत्र में पिछले वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। बिजली की प्रति व्यक्ति खपत बढ़ी है, लगभग सभी आबाद गाँवों का विद्युतीकरण हो चुका है और करोड़ों परिवारों को बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराए गए हैं। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता भी तेजी से बढ़ी है। (Central Electricity Authority)
अब अगली चुनौती “हर घर बिजली” से आगे बढ़कर “हर घर विश्वसनीय बिजली” की है।
हमारी प्रस्तावित विद्युत समाधान नीति का लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें—
पर्याप्त बिजली उत्पादन हो,
मजबूत पारेषण व्यवस्था हो,
वितरण हानि कम हो,
बिजली चोरी पर प्रभावी नियंत्रण हो,
स्मार्ट मीटरिंग हो,
शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो,
गरीब परिवारों के लिए लक्षित सहायता हो,
कृषि और उद्योग को प्रतिस्पर्धी दर पर बिजली मिले,
और नवीकरणीय ऊर्जा तथा ऊर्जा भंडारण का तेजी से विस्तार हो।
हमारा संकल्प
“पर्याप्त विद्युत, विश्वसनीय आपूर्ति, पारदर्शी प्रबंधन और उचित मूल्य—ऊर्जावान भारत, आत्मनिर्भर भारत की मजबूत आधारशिला।”
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