कृषि समाधान नीति: किसान सुधार की व्यापक परिकल्पना
“किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की आधारशिला है। इसलिए कृषि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसान को समय पर बीज और खाद मिले, सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो, उसकी फसल सुरक्षित रहे और उसे अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त हो।”
कृषि समाधान नीति: किसान की आय, संसाधन और बाजार व्यवस्था में व्यापक सुधार की परिकल्पना
“किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की आधारशिला है। इसलिए कृषि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसान को समय पर बीज और खाद मिले, सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो, उसकी फसल सुरक्षित रहे और उसे अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त हो।”
प्रस्तावना
भारत कृषि प्रधान देश है। देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। किसान देश के लिए अन्न, फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन और अनेक प्रकार की कृषि उपज का उत्पादन करता है। इसके बावजूद किसान की आर्थिक स्थिति लंबे समय से एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है।
किसानों के उत्थान, जागरूकता, वित्तीय सहायता और कृषि विकास के लिए सरकार द्वारा अनेक योजनाएँ संचालित की जाती रही हैं। इसके बावजूद अनेक किसान आज भी बीज, उर्वरक, सिंचाई, भंडारण, बाजार और उचित मूल्य जैसी मूलभूत समस्याओं का सामना करते हैं।
हमारी दृष्टि में केवल नई योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता ऐसी एकीकृत, पारदर्शी और तकनीक आधारित कृषि व्यवस्था की है, जिसमें किसान की वास्तविक स्थिति का पता हो और सरकारी सहायता सीधे किसान तक पहुँच सके।
इसी उद्देश्य से “कृषि समाधान नीति” की परिकल्पना प्रस्तुत की गई है।
वर्तमान कृषि व्यवस्था की प्रमुख समस्याएँ
किसान की समस्याएँ अनेक हैं, लेकिन हमारी परिकल्पना के अनुसार उन्हें मुख्य रूप से तीन बड़े क्षेत्रों में समझा जा सकता है—
1. बीज एवं उर्वरक की उपलब्धता
किसान को बुवाई के समय सही गुणवत्ता का बीज और खाद समय पर उपलब्ध न होना एक बड़ी समस्या है। स्थानीय स्तर पर उपलब्धता, कीमत और वितरण में होने वाली अनियमितताओं के कारण किसान को परेशानी उठानी पड़ती है।
2. सिंचाई के लिए जल
कृषि आज भी वर्षा, नदियों-नहरों और भूमिगत जल पर काफी हद तक निर्भर है। अत्यधिक वर्षा होने पर बाढ़ और कम वर्षा होने पर सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। भूमिगत जल का लगातार दोहन भी भविष्य के लिए गंभीर चुनौती है।
3. फसल सुरक्षा, भंडारण और उचित मूल्य
किसान फसल पैदा करने के बाद भी सुरक्षित नहीं होता। यदि उसके पास उचित भंडारण की सुविधा नहीं है, तो उसे मजबूरी में कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ सकती है। फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज के लिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
इसलिए किसान के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उत्पादन से लेकर भंडारण और बिक्री तक पूरी कृषि श्रृंखला को मजबूत करना आवश्यक है।
कृषि समाधान नीति का मूल उद्देश्य
कृषि समाधान नीति का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें किसान की पहचान, भूमि, उत्पादन, आवश्यकताओं, उपलब्ध संसाधनों, भंडारण और बाजार की जानकारी को एकीकृत किया जा सके।
इस व्यवस्था में तकनीक का उपयोग करके यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि—
- देश में कुल कितने किसान हैं?
- कितने किसान अपनी भूमि पर खेती करते हैं?
- कितने किसान बटाई पर खेती करते हैं?
- कितने किसान छोटे और सीमांत हैं?
- कितने क्षेत्र में कौन-कौन सी फसल उगाई जा रही है?
- किस क्षेत्र में किस कृषि सामग्री की आवश्यकता है?
- किस क्षेत्र में किस फसल की मांग है?
- देश के विभिन्न भंडार गृहों में कितना अनाज उपलब्ध है?
जब ये आँकड़े व्यवस्थित रूप से उपलब्ध होंगे, तभी कृषि योजनाओं को वास्तविक आवश्यकता के अनुसार तैयार और लागू करना आसान होगा।
किसान का डिजिटल पंजीकरण और एकीकृत प्रबंधन
प्रस्तावित व्यवस्था में छोटे-बड़े सभी किसानों को एकीकृत डिजिटल प्रणाली में पंजीकृत करने की परिकल्पना की गई है।
जो किसान अपनी भूमि पर खेती करते हैं और जो किसान बटाईदार के रूप में खेती करते हैं, दोनों को पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है।
किसान स्वयं अपना पंजीकरण कर सकेगा या किसी अधिकृत व्यक्ति अथवा केंद्र की सहायता से पंजीकरण करा सकेगा।
इससे सरकार के पास कृषि क्षेत्र से संबंधित वास्तविक और व्यवस्थित आँकड़े उपलब्ध हो सकेंगे।
किसान की वास्तविक स्थिति का आकलन
किसान की समस्या का समाधान तभी संभव है जब उसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो।
प्रस्तावित व्यवस्था में किसान की भूमि, खेती का क्षेत्र, उत्पादन, निर्भरता और कृषि गतिविधियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने की परिकल्पना है।
इससे सरकार यह समझ सकेगी कि कौन किसान पूरी तरह कृषि पर निर्भर है और किस किसान को किस प्रकार की सहायता या प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
विशेष रूप से छोटे किसानों को उनकी भूमि और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसी फसलों तथा कृषि गतिविधियों का प्रशिक्षण देने की परिकल्पना है, जिनसे उन्हें वर्ष भर आय प्राप्त करने में सहायता मिल सके।
बीज और उर्वरक प्रबंधन
किसान की पहली आवश्यकता है—सही समय पर सही कृषि सामग्री।
इसीलिए कृषि समाधान नीति में बीज, उर्वरक और अन्य कृषि सामग्री के वितरण को एक केंद्रीय डिजिटल प्रणाली से जोड़ने की परिकल्पना की गई है।
सरकारी और निजी दोनों प्रकार के कृषि सामग्री वितरण केंद्रों को एकीकृत प्रणाली में पंजीकृत किया जा सकता है।
इस प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक बिक्री केंद्र के संबंध में यह जानकारी उपलब्ध हो सकेगी कि—
- कौन-सा बीज उपलब्ध है?
- कितनी मात्रा में उपलब्ध है?
- कौन-सा उर्वरक उपलब्ध है?
- उसका निर्धारित मूल्य क्या है?
- किस केंद्र पर कितना स्टॉक मौजूद है?
इससे किसान को कृषि सामग्री के लिए अनावश्यक रूप से अलग-अलग स्थानों पर भटकना नहीं पड़ेगा।
कालाबाजारी और मनमानी कीमत पर नियंत्रण
कृषि सामग्री की उपलब्धता और मूल्य को डिजिटल रूप से दर्ज करने से बिक्री केंद्रों की मनमानी पर नियंत्रण लगाने में सहायता मिल सकती है।
किसान को निर्धारित मूल्य और उपलब्ध स्टॉक की जानकारी पहले से मिल सकेगी।
इसके लिए प्रस्तावित व्यवस्था में किसान के लिए टोल-फ्री शिकायत एवं सूचना सेवा उपलब्ध कराने की परिकल्पना है।
किसान बीज, खाद, स्टॉक, कीमत या किसी अन्य अनियमितता के संबंध में शिकायत दर्ज कर सकेगा और आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकेगा।
सिंचाई व्यवस्था में सुधार
कृषि उत्पादन के लिए पानी सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है।
वर्तमान में किसान मुख्य रूप से तीन स्रोतों पर निर्भर करता है—
- वर्षा का जल
- नदियाँ और नहरें
- भूमिगत जल
इन तीनों स्रोतों से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कृषि समाधान नीति में जल प्रबंधन को विशेष महत्व दिया गया है।
वर्षा जल का प्रबंधन
यदि अत्यधिक वर्षा होती है, तो बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। यदि वर्षा कम होती है, तो वही क्षेत्र सूखे का सामना कर सकता है।
इसलिए वर्षा जल को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय उसे संसाधन के रूप में संरक्षित और उपयोग करने की आवश्यकता है।
प्रस्तावित नीति में वर्षा जल प्रबंधन के लिए दो प्रमुख उपायों की परिकल्पना की गई है।
पहला उपाय: नदियों और नहरों का बेहतर प्रबंधन
बाढ़ की संभावना वाले क्षेत्रों की नदियों को आवश्यकतानुसार नहरों से जोड़ने, सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक सिंचाई व्यवस्था का विस्तार करने तथा छोटी नदियों के जीर्णोद्धार का प्रस्ताव है।
नदियों के किनारों को आवश्यकतानुसार सुरक्षित करने और जल प्रवाह को व्यवस्थित करने की दिशा में भी कार्य करने की परिकल्पना है।
दूसरा उपाय: भू-जल पुनर्भरण
जहाँ वर्षा का पानी बड़ी मात्रा में एकत्र होता है, वहाँ भू-जल पुनर्भरण की व्यवस्था विकसित करने का प्रस्ताव है।
शहर, नगर और ग्राम स्तर पर उपयुक्त स्थानों पर जल पुनर्भरण संयंत्र एवं फिल्टर ट्यूब जैसी तकनीकों का उपयोग करके वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुँचाने की परिकल्पना है।
इसका उद्देश्य भूमिगत जल के लगातार हो रहे दोहन की भरपाई करना है।
फसल सुरक्षा और उचित मूल्य
किसान के सामने उत्पादन के बाद दो सबसे बड़ी चुनौतियाँ होती हैं—
फसल को सुरक्षित रखना और उसका उचित मूल्य प्राप्त करना।
यदि किसान के पास अपनी उपज रखने के लिए पर्याप्त भंडारण सुविधा नहीं है, तो उसे तत्काल बिक्री के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
कृषि समाधान नीति में इसी समस्या के समाधान के लिए भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार को एकीकृत करने की परिकल्पना की गई है।
क्षेत्र की उत्पादन क्षमता के अनुसार भंडारण
प्रस्तावित व्यवस्था में प्रत्येक क्षेत्र की उत्पादन क्षमता और कृषि आवश्यकता के अनुसार भंडारण गृह विकसित करने का विचार है।
अलग-अलग कृषि उत्पादों के लिए अलग-अलग भंडारण व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
अनाज के लिए
- गेहूँ
- धान
- दलहन
- तिलहन
के लिए पर्याप्त भंडारण गृह बनाए जाने की परिकल्पना है।
फल और सब्जियों के लिए
फल और सब्जियों के लिए शीत भंडारण केंद्र विकसित करने का प्रस्ताव है।
इसके साथ—
- परिरक्षण केंद्र
- पैकेजिंग केंद्र
- प्रसंस्करण केंद्र
- परिवहन व्यवस्था
को भी जोड़ा जा सकता है।
इससे जल्दी खराब होने वाली कृषि उपज को बाजार तक सुरक्षित पहुँचाने में सहायता मिल सकती है।
किसान को सुरक्षित भंडारण की सुविधा
कृषि समाधान नीति में किसान को अपनी उपज को निर्धारित भंडारण केंद्र में सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता देने की परिकल्पना की गई है।
प्रस्ताव के अनुसार किसान की उपज की बिक्री होने तक भंडारण सुविधा के लिए शुल्क न लेने की व्यवस्था विकसित करने का विचार है।
इसका उद्देश्य किसान को फसल काटने के तुरंत बाद मजबूरी में बेचने से बचाना है।
यदि बाजार में कीमत कम है, तो किसान अपनी उपज को सुरक्षित रखकर बेहतर मूल्य मिलने की प्रतीक्षा कर सकेगा।
घर बैठे फसल बेचने की सुविधा
डिजिटल तकनीक के माध्यम से किसान को अपनी उपज बेचने के लिए एक ऑनलाइन मंच उपलब्ध कराने की परिकल्पना है।
किसान अपने मोबाइल या किसान ऐप के माध्यम से अपनी उपज की जानकारी दर्ज कर सकेगा और देश के विभिन्न व्यापारियों से संपर्क कर सकेगा।
इससे किसान और व्यापारी के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया जा सकता है।
किसान मंडी की परिकल्पना
कृषि समाधान नीति में किसान के लिए दो प्रमुख बाजार मंचों की परिकल्पना की गई है।
पहला — किसान ऐप
किसान डिजिटल माध्यम से देश के किसी भी व्यापारी को अपनी उपज की जानकारी देकर बिक्री कर सकेगा।
दूसरा — किसान मंडी
स्थानीय स्तर पर किसान मंडी विकसित करने का प्रस्ताव है, जहाँ किसान स्वयं या अधिकृत व्यापारी के माध्यम से अपनी कृषि उपज बेच सकेगा।
यदि निर्धारित अवधि में उपज की बिक्री नहीं हो पाती है, तो प्रस्तावित व्यवस्था में सरकार द्वारा निर्धारित समय के भीतर शेष उपज के भुगतान की व्यवस्था का विचार है।
उचित मूल्य की व्यवस्था
किसान की समृद्धि के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उसे अपनी उपज का उचित मूल्य मिलना भी आवश्यक है।
प्रस्तावित कृषि समाधान नीति में अनाज, दलहन और तिलहन के साथ-साथ फल और सब्जियों के लिए भी मूल्य सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की परिकल्पना की गई है।
नीति में न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ उत्पादन की गुणवत्ता के आधार पर अधिक मूल्य प्राप्त करने की संभावना को भी शामिल करने का विचार है।
विशेष रूप से जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए बेहतर गुणवत्ता वाली उपज को अतिरिक्त मूल्य देने की परिकल्पना की गई है।
किसान को त्वरित भुगतान
प्रस्तावित व्यवस्था में किसान की उपज के भंडारण के बाद उसके निर्धारित मूल्य के आधार पर एक हिस्से का भुगतान शीघ्र करने की परिकल्पना है।
इसका उद्देश्य किसान की तत्काल आर्थिक आवश्यकता को पूरा करना है, ताकि उसे आर्थिक दबाव में अपनी पूरी उपज कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।
देशभर में उपज बेचने की स्वतंत्रता
कृषि समाधान नीति में किसान को अपने कृषि उत्पाद को देश के विभिन्न क्षेत्रों में बेचने की स्वतंत्रता देने की परिकल्पना की गई है।
इसके लिए एक साझा डिजिटल तकनीकी मंच विकसित किया जा सकता है, जिसके माध्यम से किसान सीधे विभिन्न व्यापारियों से संपर्क कर सके।
इस व्यवस्था में मूल्य निर्धारण को पारदर्शी रखने तथा अत्यधिक मूल्य वृद्धि और कालाबाजारी को नियंत्रित करने के लिए निर्धारित मूल्य सीमाओं की व्यवस्था का प्रस्ताव है।
किसान और व्यापारी के बीच सीधा संपर्क
किसान और अंतिम खरीदार या व्यापारी के बीच जितने अधिक अनावश्यक स्तर होंगे, किसान को अपनी उपज का उतना ही कम हिस्सा मिल सकता है।
इसलिए प्रस्तावित डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य किसान और व्यापारी के बीच सीधा संपर्क स्थापित करना है।
इससे किसान को बाजार की जानकारी मिल सकती है और व्यापारी को भी उपलब्ध उपज की वास्तविक जानकारी प्राप्त हो सकती है।
कृषि उत्पादों की डिजिटल जानकारी
प्रस्तावित व्यवस्था में प्रत्येक भंडार गृह में रखे अनाज और कृषि उत्पादों का डिजिटल रिकॉर्ड रखने की परिकल्पना की गई है।
इससे यह जानकारी उपलब्ध हो सकेगी कि—
- किस भंडार गृह में कितना अनाज है?
- किस प्रकार की फसल कितनी मात्रा में उपलब्ध है?
- किस किसान की कितनी उपज सुरक्षित है?
- किस क्षेत्र में किस उत्पाद की कमी है?
- किस क्षेत्र में किस उत्पाद की अधिकता है?
इस प्रकार कृषि उत्पादन और बाजार की मांग के बीच बेहतर संतुलन बनाने का प्रयास किया जा सकता है।
मांग के अनुसार फसल उत्पादन
वर्तमान कृषि व्यवस्था में कई बार किसी फसल का उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो जाता है और किसी दूसरी फसल की कमी हो सकती है।
इससे एक ओर किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता और दूसरी ओर कुछ उत्पादों की कमी के कारण बाजार में कीमत बढ़ सकती है।
कृषि समाधान नीति में देश की मांग और उपलब्ध भंडार के आधार पर किसानों को यह जानकारी देने की परिकल्पना की गई है कि किस क्षेत्र में किस फसल की कितनी आवश्यकता है।
इससे किसान को उत्पादन संबंधी बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है।
कृषि उत्पादन और बाजार का संतुलन
एक प्रभावी कृषि व्यवस्था के लिए तीन चीजों के बीच संतुलन आवश्यक है—
उत्पादन → भंडारण → बाजार की मांग
यदि उत्पादन अधिक है लेकिन भंडारण नहीं है, तो किसान को नुकसान हो सकता है।
यदि उत्पादन कम है लेकिन मांग अधिक है, तो बाजार में कीमत बढ़ सकती है।
यदि भंडारण और परिवहन की व्यवस्था कमजोर है, तो उत्पादन होने के बावजूद उपभोक्ता तक पर्याप्त मात्रा में उत्पाद नहीं पहुँच सकता।
इसीलिए कृषि समाधान नीति में इन सभी स्तरों को एक साझा डिजिटल प्रणाली से जोड़ने की परिकल्पना की गई है।
मूल्य निर्धारण के लिए केंद्रीय और राज्य स्तरीय व्यवस्था
प्रस्तावित नीति में कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण के लिए केंद्रीय और राज्य स्तर पर समितियाँ गठित करने की परिकल्पना है।
इन समितियों द्वारा किसानों की उत्पादन लागत, बाजार की मांग, उपलब्धता, परिवहन लागत और अन्य संबंधित परिस्थितियों का अध्ययन करके मूल्य व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
अलग-अलग राज्यों की आवश्यकताओं के अनुसार कृषि उत्पादों की आपूर्ति का भी डिजिटल स्तर पर समन्वय किया जा सकता है।
किसान, सरकार, व्यापारी और उपभोक्ता—चारों के लिए पारदर्शी व्यवस्था
कृषि समाधान नीति का उद्देश्य केवल किसान को लाभ पहुँचाना नहीं, बल्कि कृषि बाजार से जुड़े सभी पक्षों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करना है।
किसान के लिए
- कृषि सामग्री की उपलब्धता
- सिंचाई की बेहतर व्यवस्था
- भंडारण की सुविधा
- बाजार की जानकारी
- उचित मूल्य
- डिजिटल बिक्री मंच
सरकार के लिए
- किसानों के वास्तविक आँकड़े
- फसल उत्पादन की जानकारी
- योजनाओं का बेहतर लक्ष्यीकरण
- भंडारण की स्थिति
- बाजार की निगरानी
- कृषि नीति बनाने में सहायता
व्यापारी के लिए
- उपलब्ध उपज की जानकारी
- किसान से सीधा संपर्क
- डिजिटल खरीद प्रक्रिया
- पारदर्शी मूल्य व्यवस्था
उपभोक्ता के लिए
- कृषि उत्पादों की बेहतर उपलब्धता
- आपूर्ति का संतुलन
- मूल्य में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में सहायता
- खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में प्रयास
कृषि को आत्मनिर्भरता से जोड़ना
कृषि केवल खाद्यान्न उत्पादन का क्षेत्र नहीं है। इसमें रोजगार, व्यवसाय, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, निर्यात, स्थानीय उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं।
यदि किसानों को सही प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, बाजार की जानकारी, भंडारण और उचित मूल्य मिले, तो कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रमुख माध्यम बन सकती है।
विशेष रूप से छोटे किसानों को ऐसी कृषि प्रणाली से जोड़ना आवश्यक है जिससे वे केवल एक फसल पर निर्भर न रहें और वर्ष भर आय के विभिन्न स्रोत विकसित कर सकें।
हमारी कृषि समाधान नीति के प्रमुख स्तंभ
कृषि समाधान नीति को निम्नलिखित प्रमुख आधारों पर विकसित करने की परिकल्पना है—
1. किसान पंजीकरण
देश के प्रत्येक किसान का डिजिटल पंजीकरण।
2. किसान की वास्तविक स्थिति का आकलन
भूमि, उत्पादन और कृषि निर्भरता का व्यवस्थित रिकॉर्ड।
3. बीज एवं उर्वरक प्रबंधन
कृषि सामग्री के स्टॉक, वितरण और मूल्य की डिजिटल निगरानी।
4. सिंचाई प्रबंधन
वर्षा जल, नहरों और भूमिगत जल का बेहतर प्रबंधन।
5. भू-जल पुनर्भरण
वर्षा जल को सुरक्षित करके भूमिगत जल स्तर को बनाए रखने का प्रयास।
6. भंडारण व्यवस्था
अनाज के लिए भंडार गृह और फल-सब्जियों के लिए शीत भंडारण केंद्र।
7. प्रसंस्करण और पैकेजिंग
कृषि उत्पादों को बाजार योग्य बनाने के लिए आवश्यक सुविधाएँ।
8. उचित मूल्य
किसान की उत्पादन लागत और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मूल्य व्यवस्था।
9. किसान ऐप
किसान को डिजिटल माध्यम से देशभर के बाजारों और व्यापारियों से जोड़ना।
10. किसान मंडी
स्थानीय स्तर पर किसान को सीधे बाजार उपलब्ध कराना।
11. डिजिटल कृषि बाजार
कृषि उत्पादन, भंडारण और मांग की जानकारी को एकीकृत करना।
12. कृषि उत्पादन संतुलन
देश की मांग के अनुसार फसल उत्पादन को व्यवस्थित करने का प्रयास।
हमारा संकल्प
किसान को केवल चुनाव के समय सहायता और वादों का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
कृषि व्यवस्था को एक ऐसी स्थायी प्रणाली की आवश्यकता है जिसमें किसान को उत्पादन से पहले, उत्पादन के दौरान और उत्पादन के बाद—हर चरण में आवश्यक सहायता और जानकारी मिल सके।
हमारी कृषि समाधान नीति का उद्देश्य किसान की समस्याओं को अलग-अलग योजनाओं में बाँटने के बजाय उन्हें एक एकीकृत कृषि प्रबंधन प्रणाली से जोड़ना है।
हम ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना करते हैं जिसमें—
किसान की पहचान स्पष्ट हो,
किसान की भूमि और उत्पादन का रिकॉर्ड हो,
बीज और खाद समय पर उपलब्ध हो,
सिंचाई के लिए जल की बेहतर व्यवस्था हो,
फसल सुरक्षित रहे,
भंडारण की सुविधा मिले,
किसान को बाजार की जानकारी मिले,
उसे अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता हो,
और उसकी मेहनत का उचित मूल्य सुनिश्चित करने की दिशा में प्रभावी व्यवस्था विकसित हो।
अंतिम संकल्प
“समृद्ध किसान ही आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव है।”
कृषि को केवल अनुदान और कर्जमाफी की राजनीति से निकालकर उत्पादन, प्रबंधन, भंडारण, बाजार, तकनीक और उचित मूल्य की स्थायी व्यवस्था से जोड़ना ही कृषि सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
भारत महापरिवार पार्टी
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